
जीवन्त अनुभव हेतु ध्यान में रखते हुए वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप आवासीय भवन का रेखांकित प्रारूप तथा भवन में कक्ष विन्यास का विधान पूर्व में विवेकानुसार अवश्य ही करना चाहिए। वर्तमान समय में नगरों, उपनगरों एवं महानगरों की आवासीय व्यवस्थाओं तथा नियोजन में यह देखने में आता है कि अधिकांश बसति विन्यासक एवं विकासक (Colonizer & Developer) और गृहस्वामी भी वास्तुसम्मत भवन निर्माण करना एवं कराना चाहते हैं। इस प्रकार की भावना को ध्यान में रखते हुए वास्तुविद को उसके भेद-उपभेदों तथा उनके फल से भली-भांति परिचित होना चाहिए।
वास्तुशास्त्र में सैद्धान्तिक रूप से वास्तु के निम्नलिखित तीन भेद प्राप्त होते हैं –
1. स्थावर वास्तु
यह अचल वास्तु है, जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया नहीं जा सकता।
जैसे – भवन, मकान, मंदिर, महल, किला, नगर आदि।
इसमें भूमि चयन, दिशा, प्रवेश द्वार, कमरों की व्यवस्था आदि का विशेष महत्व होता है।
2. जंगम वास्तु
यह चल वास्तु है, जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।
जैसे – वाहन, फर्नीचर, यंत्र, मशीनें, चल संपत्ति आदि।
इनकी दिशा और स्थान व्यवस्था भी सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित करती है।
3. मानुष वास्तु
यह मनुष्य और जीवों से संबंधित वास्तु है।
अर्थात् व्यक्ति का शरीर, उसका आचरण, उसकी दिनचर्या और ऊर्जा भी वास्तु का ही एक भाग है।
यदि व्यक्ति का आचरण, विचार और जीवनशैली संतुलित हो, तो वास्तु के शुभ फल अधिक प्रभावी होते हैं।
वास्तुशास्त्र पंचमहाभूतों पर आधारित है:
पृथ्वी
जल
अग्नि
वायु
आकाश
इन तत्वों का संतुलन दिशाओं के माध्यम से स्थापित किया जाता है। वास्तु का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भवन का प्रत्येक भाग इन तत्वों के अनुरूप व्यवस्थित हो।
प्राचीन ग्रंथों में वास्तु सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, विशेषकर:
बृहत्संहिता – भूमि परीक्षण और दिशा विज्ञान
समरांगण सूत्रधार – प्रासाद एवं गृह रचना
मायमतम् – आयाम और मंडल सिद्धांत
विश्वकर्मा प्रकाश – वास्तुपुरुष मंडल एवं फल सिद्धांत
इन ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि भवन निर्माण से पहले विवेकपूर्वक रेखांकित प्रारूप [Blueprint] बनाना आवश्यक है।
आवासीय वास्तु एवं औद्योगिक वास्तु की योजना में निर्मित होने वाले भवन का प्रत्येक कक्ष अपनी उपयोगिता को सार्थक कर दे — यही वास्तु नियोजन का नैसर्गिक सामर्थ्य है। वास्तुशास्त्र का मूल उद्देश्य यह है कि भवन केवल रहने का स्थान न होकर, जीवन की समग्र आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम बने।
किसी भी आवासीय भवन में मुख्य रूप से शयन कक्ष, बैठक कक्ष, भोजन कक्ष, पूजा कक्ष एवं भंडारण कक्ष का निर्माण किया जाता है। गृहस्वामी की सामर्थ्य एवं आवश्यकता के अनुसार व्यायामशाला, वाटिका, अध्ययन कक्ष आदि का निर्माण भी विशेष रूप से किया जा सकता है। इन कक्षों के निर्माण और दिशा-निर्धारण का उद्देश्य यह है कि जब गृहपति मुख्य द्वार से अपने भवन में प्रवेश करे तो उसकी चिंता, श्रम एवं मानसिक तनाव शांति में परिवर्तित हो जाए। जब वह शयन कक्ष में जाए तो उसे सुखपूर्ण, गम्भीर और शांत निद्रा प्राप्त हो। भोजन कक्ष में बैठकर वह भोजन का आनंद एवं कृतज्ञ भाव से आहार ग्रहण कर सके। रतिकक्ष में दाम्पत्य जीवन का संतुलित आनंद प्राप्त हो तथा पूजा गृह में ईश्वर चिंतन करते समय मन एकाग्र होकर ध्यान में स्थिर हो सके।
इस प्रकार प्राकृतिक तत्वों के संतुलन, दिशाओं के सामंजस्य तथा सुंदर कलात्मक विन्यास से युक्त भवन का विधान वास्तुशास्त्र द्वारा किया जाता है, जिससे गृह में शांति, सुख एवं समृद्धि का स्थायी वास हो।
शास्त्रीय आधार एवं ग्रंथ संदर्भ
वास्तुशास्त्र में कक्ष विन्यास और दिशा निर्धारण का वर्णन अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं :
बृहत्संहिता (वराहमिहिर)
इसमें भवन निर्माण, दिशा विचार एवं भूमि चयन का विस्तृत वर्णन है।
समरांगण सूत्रधार (राजा भोज)
इस ग्रंथ में प्रासाद, गृह विन्यास, द्वार, कक्ष विभाजन एवं स्थापत्य के सूक्ष्म सिद्धांत बताए गए हैं।
मायमतम्
दक्षिण भारतीय वास्तु पर आधारित यह ग्रंथ आवासीय भवनों के कक्ष विन्यास और आयाम शास्त्र का विस्तृत वर्णन करता है।
विश्वकर्मा प्रकाश
इसमें वास्तुपुरुष मंडल, दिशानुसार कक्ष व्यवस्था और शुभ-अशुभ परिणामों का विवेचन मिलता है।
इन ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि भवन निर्माण से पहले विवेकपूर्वक रेखांकित प्रारूप [Blueprint] बनाना आवश्यक है।
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