वैकुण्ठ एकादशी की कथा
प्राचीन काल की बात है। एक समय दैत्यराज मुर ने देवताओं और ऋषियों को अत्यंत कष्ट देना प्रारंभ कर दिया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने दैत्य मुर से घोर युद्ध किया। लंबे समय तक चले इस युद्ध के बाद भगवान विष्णु विश्राम हेतु एक गुफा में गए। उसी समय दैत्य मुर ने छिपकर उन पर आक्रमण करने का प्रयास किया। तभी भगवान विष्णु के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसने दैत्य मुर का वध कर दिया।
भगवान विष्णु ने उस दिव्य शक्ति को वरदान दिया कि जो भी भक्त मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत रखेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी और उसके समस्त पाप नष्ट होंगे। यही दिन वैकुण्ठ एकादशी कहलाया।
ऐसा माना जाता है कि इस दिन वैकुण्ठ लोक के द्वार खुल जाते हैं, और सच्चे भाव से की गई भक्ति सीधे भगवान विष्णु तक पहुँचती है। इस दिन उपवास, जप, ध्यान और धर्माचरण का विशेष महत्व है।
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दीपक मंत्र:
ॐ दीपज्योति परब्रह्म, दीप सर्व तमोपह।
दीपेन साध्यते सर्वं, संध्यादीप नमोऽस्तुते॥
तिल-गुड़ अर्पण एवं भोग पहले भगवान को अर्पित करें फिर परिवार में बाँटें
शांत स्थान पर बैठकर जप करें।
जप मंत्र:
ॐ नमः शिवाय (11 या 21 बार)
या
ॐ सूर्याय नमः (108 बार)
दान विधि (अत्यंत शुभ)
क्या दान करें:
तिल, गुड़, कंबल, ऊनी वस्त्र, अनाज, सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मण, वृद्ध या जरूरतमंद को
दान मंत्र :
“इदं दानं मया दत्तं सूर्यप्रीत्यर्थं।”
मकर संक्रांति पूजा का महत्व
मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे शुभता, आरोग्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस दिन सूर्य उपासना, दान और संयम विशेष फलदायी माने गए हैं।
सूर्य पूजा की विधि
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्नान के जल में तिल या गंगाजल मिलाएँ, साफ वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करें।
मन में संकल्प लें कि यह पूजा आप शुद्ध भाव से कर रहे हैं
संकल्प मंत्र :
“मम सर्वपापक्षयपूर्वकं सूर्यदेव प्रसन्नार्थं मकरसंक्रांति पूजनं करिष्ये।”
सूर्य अर्घ्य विधि
सामग्री:
तांबे का लोटा, जल, लाल फूल, कुमकुम, अक्षत । सूर्योदय के समय खुले स्थान में खड़े हों, तांबे के लोटे में जल, लाल फूल व कुमकुम डालें फिर सूर्य की ओर देखते हुए जल अर्पित करें ।
मंत्र :
ॐ सूर्याय नमः
ॐ आदित्याय नमः
11 बार जप करें
तिल-दीपक एवं दीपदान
घर के मंदिर में या मुख्य द्वार पर तिल के तेल का दीपक जलाएँ, दीपक के पास तिल या तिल-गुड़ रखें।
लोहड़ी की परंपरा और कथा: कृतज्ञता और नई शुरुआत
लोहड़ी भारत के उत्तर भाग में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकपर्व है, जो विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व शीत ऋतु के अंत और ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है तथा प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध को दर्शाता है। लोहड़ी का मुख्य केंद्र अग्नि है, जिसे ऊर्जा, पवित्रता और जीवन का प्रतीक माना गया है।
लोहरी का त्योहार जब आता है, तो “सुंदर मुंद्रिये हो… दुल्ला भट्टी वाला हो…” गीत गूंजता है। यह सिर्फ एक उत्सव गीत नहीं, बल्कि एक वीर की याद है जिसने समाज के लिए अपना जीवन समर्पित किया। मान्यता के अनुसार लोहड़ी की कथा वीर और परोपकारी दुल्ला भट्टी से जुड़ी है। दुल्ला भट्टी की कहानी जो की पंजाब की मिट्टी से जुड़ी है। उन्हें “पंजाब का रॉबिनहुड” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। यह कहानी लोहरी पर्व से गहराई से जुड़ी है जो आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। मुग़ल काल के समय दुल्ला भट्टी ने समाज में फैले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई और कई निर्धन परिवारों की कन्याओं की रक्षा की। उन्होंने न केवल उन्हें अत्याचार से बचाया, बल्कि उनका सम्मानपूर्वक विवाह भी संपन्न कराया। इसी कारण दुल्ला भट्टी को लोकनायक के रूप में देखा जाता है और लोहड़ी के पारंपरिक गीतों में उनका नाम आज भी आदर से लिया जाता है।
कृषि संस्कृति के इस पर्व का एक और महत्वपूर्ण पक्ष फसल से संबंधित है। लोहड़ी के समय रबी फसल की बुआई पुरी हो चुकी होती है और किसान अच्छी उपज की प्रार्थना करते हैं। अग्नि में तिल, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और मक्का अर्पित करना समृद्धि, कृतज्ञता और आने वाले समय की शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा सूर्य के उत्तरायण होने और जीवन में नई ऊर्जा के आगमन का संकेत भी देती है।
लोहड़ी सामाजिक और पारिवारिक दोनों जीवन में विशेष महत्व रखती है। यह पर्व सामूहिक रूप से मनाया जाता है, जहाँ परिवार एकत्र होकर आनंद और आपसी प्रेम के साथ मनाते हैं। विशेष रूप से नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए लोहड़ी को अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि यह नए जीवन और नए आरंभ का प्रतीक है।
लोहड़ी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों का उत्सव है। यह हमें कृतज्ञता, साहस, सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिकता का संदेश देता है, जो आज के आधुनिक जीवन में भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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